अणिहुदमणसा इंदियसप्पाणि णिगेण्हिदुं ण तीरंति ।
विज्जामंतोसहधीणेणव आसीविसा सप्पा॥1845॥
विद्या औषधि मन्त्र बिना ज्यों नहिं वश हो दृष्टि विष सर्प ।
त्यों एकाग्र चित्त बिन वश में होता नहीं इन्द्रिय सर्प॥1845॥
अन्वयार्थ : जैसे विद्या, मंत्र, औषधि से रहित पुरुष आशीविष जाति के सर्प का निग्रह करने में समर्थ नहीं है, तैसे ही मन को निश्चल नहीं करने वाला चपलचित्त का धारक पुरुष भी इन्द्रियरूप सर्प को वश करने में समर्थ नहीं होता है ।

  सदासुखदासजी