
पावपयोगासवदारणिरोधो अप्पमादफलिगेण ।
कीरइ फलिगेण जहा णावाए जलासवणिरोधो॥1846॥
ज्यों लकड़ी के पाटे से नौका में आता जल रुकता ।
अप्रमाद रूपी पाटे से अशुभभाव आस्रव रुकता॥1846॥
अन्वयार्थ : विकथादि पंचदश/पंद्रह प्रमाद - ये पाप प्रयोग हैं । जैसे नाव में जल आने के द्वार को काष्ठ के फलक द्वारा रोक देते हैं, तैसे ही अप्रमादरूप फलक से पापप्रयोग को रोक देते हैं ।
सदासुखदासजी