
गुत्तिपरिखाइगुत्तं संजमणयरं ण कम्मरिउसेणा ।
बंधेइ सत्तुसेणा पुरं व परिखादिहिं सुगुत्तं॥1847॥
ज्यों परिखा से रक्षित पुर में शत्रु सैन्य नहिं करे प्रवेश ।
गुप्ति सुरक्षित संयम-पुर में कर्म शत्रु नहिं करे प्रवेश॥1847॥
अन्वयार्थ : जैसे खाई, कोट इत्यादि से रक्षित पुर को शत्रु की सेना भंग - नष्ट करने में समर्थ नहीं होती, तैसे ही मन-वचन-काय की गुप्तिरूप खाई, कोट से रक्षित संयमनगर को कर्मरूप वैरी की सेना भंग करने में समर्थ नहीं होती है ।
सदासुखदासजी