
समिदिदिढणावमारुहिय अप्पमत्तो भवोदधिं तरदि ।
छज्जीवणिकायवधादिपावमगरेहिं अच्छित्तो॥1848॥
समितिरूप दृढ़ नौका पर आरूढ़ प्रमाद विहीन क्षपक ।
पापरूप मच्छों से बचकर भव समुद्र को पार करे॥1848॥
अन्वयार्थ : जो प्रमाद रहित पुरुष हैं, वे समितिरूप दृढ नाव में बैठकर छहकाय के जीवों की हिंसा से उत्पन्न पापरूप जलचर को स्पर्श नहीं करके संसार-समुद्र से तिर जाते हैं ।
सदासुखदासजी