दारेव दारवालो हिदये सुप्पणिहिदा सदी जस्स ।
दोसा धंसंति ण तं पुरं सुगुत्तं जहा सत्तु॥1849॥
जिसके उर में द्वारपालवत् तत्त्वज्ञान जागृत रहता ।
राग-द्वेष रूपी शत्रु उसमें न प्रवेश कभी करता॥1849॥
अन्वयार्थ : जैसे अच्छी तरह से रक्षित पुरुष को, शत्रु विध्वंस करने में समर्थ नहीं होता और जैसे दरवाजे से द्वारपाल अयोग्य पुरुष को अन्दर प्रवेश नहीं करने देता, तैसे ही जिसके हृदय में वस्तुतत्त्व के सत्यार्थ स्वरूप की स्मृति मौजूद है । उसके अन्तरंग में दोष प्रवेश करके तिरस्कार/दूषित नहीं कर सकते हैं ।

  सदासुखदासजी