जो खु सदिविप्पहूणो सो दोसरिऊण गेज्झओ होइ ।
अंधलगोव वरंतो अरीणमविदिज्त्तओ चेव॥1850॥
लेकिन अन्धा-लूला मानव शत्रु सैन्य से घिर जाता ।
तत्त्वज्ञान से हीन मनुज त्यों दोष शत्रु से घिर जाता॥1850॥
अन्वयार्थ : जो स्व-स्वरूप और पर के स्वरूप की स्मृति से रहित है, पर्याय में ही अपनत्व मान करके अन्ध हो रहा है, वह पुरुष दोष रूपी वैरियों से ग्रस्त होता है । जैसे अकेला अन्धपुरुष वन में भ्रमता हुआ नष्ट हो जाता है; तैसे ही भेदविज्ञानरहित पुरुष अनेक दोषों से लिप्त होता है ।

  सदासुखदासजी