
अमुयंतो सम्मत्तं परीसहसमोगरे उदीरंतो ।
णेव सदी मोत्तव्वा एत्व दु आराधणा भणिया॥1851॥
घोर परीषह सहे किन्तु जो सम्यग्दर्शन नहीं तजे ।
तत्त्व-ज्ञान को नहीं भूलता वह मुनि आराधना करे॥1851॥
अन्वयार्थ : सम्यक्त्व को नहीं छोडने वाले पुरुष पर परिषहों की सेना समूह उदीरणा/ को प्राप्त होने पर भी स्मृति/भेदज्ञान, स्वरूप का स्मरण छोडने/त्यागने योग्य नहीं है । इन भावों से ही आराधना होती है - ऐसा भगवान ने कहा है । इसप्रकार संवर भावना का वर्णन किया ।
सदासुखदासजी