+ अब निर्जरा भावना बारह गाथाओं में कहते हैं - -
इय सव्वासवसंवरसंवुडकम्मासवो भवित्तु मुणी ।
कुव्वंति तवं विविहं सुत्तुत्तं णिज्जराहेदुं॥1852॥
इसप्रकार संवर के द्वारा जिनने कर्मास्रव रोका ।
एेसे मुनि सूत्रोक्त विधि से तप से करते हैं निर्जरा॥1852॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार सभी अवसरों में संवर के कारणों द्वारा रुके हैं कर्म के आस्रव जिनके, ऐसे होते हुए मुनि जिनसूत्र में जो अनेक प्रकार निर्जरा के कारण रूप तप कहे हैं, उन्हें करते हैं ।

  सदासुखदासजी