
तवसा विणा ण मोक्खो संवरमित्तेण होइ कम्मस्स ।
उवभोगादीहिं विणा धणं ण हु खीयदि सुगुत्तं॥1853॥
यथा सुरक्षित धन उपभोग बिना न कभी हो सकता क्षीण ।
मात्र कर्म संवर से तप के बिना न हों कर्म प्रक्षीण॥1853॥
अन्वयार्थ : तपश्चरण बिना संवर मात्र से ही कर्म से नहीं छूटते हैं । जैसे कन्या, धन की अच्छी तरह रक्षा करने पर भी उपभोगादि के बिना क्षीण नहीं होता है ।
सदासुखदासजी