
कालेण उवायेण य पच्चंति जहा वणप्फदिफलाइं ।
तह कालेण तवेण य पच्चंति कदाणि कम्माणि॥1855॥
यथा वनस्पति के फल पकते काल पाय अरु यत्नों से ।
तथा पूर्वकृत कर्म खिरे फल देकर के अथवा तप से॥1855॥
अन्वयार्थ : पूर्वकाल में बँधे कर्मों का छूटना, वह निर्जरा है । वह निर्जरा दो प्रकार की है । एक अपने उदय काल में अपना रस-फल देकर निर्जरता है, वह सविपाक निर्जरा है और उदय काल के बिना ही तपश्चरणादि के प्रभाव से, बिना रस-फल दिये कर्म का निर्जरना, वह अविपाकनिर्जरा है । जैसे वनस्पति का फल काल पाकर वृक्ष की डाली पर क्रम से पकता है और पाल में रखने रूप उपाय के द्वारा शीघ्रता से ही पकता है, तैसे ही पूर्व में उत्पन्न किये कर्म समय पाकर उदय देकर ही निर्जरते हैं और तप के प्रभाव से पककर निर्जर जाते हैं । ऐसी निर्जरा दो प्रकार की है ।
सदासुखदासजी