ण हु कम्मस्स अवेदिदफलस्स कस्सइ हवेज्ज परिमोक्खो ।
होज्ज व तस्स विणासो तवग्गिणा डज्झमाणस्स॥1857॥
बिन भोगे फल नहीं छूट सकता है कोई कर्म कभी ।
किन्तु कर्मफल दिये बिना ही कर्म खिरें तप-अग्नि से॥1857॥
अन्वयार्थ : फल दिये बिना कोई भी कर्म छूटते नहीं हैं । अपना फल देकर ही खिरते है, वह तो सविपाकनिर्जरा है और तप करके दग्ध किये कर्म अपना रस दिये बिना भी निर्जर जाते हैं, वह अविपाक निर्जरा है ।

  सदासुखदासजी