
डहिऊण जहा अग्गी विद्धं सदि सुबहुगंपि तणरासी ।
विद्धं सेदि तवग्गी तह कम्मतणं सुबहुगंपि॥1858॥
जैसे जलती अग्नि भस्म कर देती बड़ा घास का ढेर ।
तैसे तपरूपी अग्नि भी करे नष्ट कमाब का ढेर॥1858॥
अन्वयार्थ : जैसे अग्नि स्वयं प्रज्वलित होकर बहुत तृण की राशि को जला देती है, तैसे ही तपरूपी अग्नि बहुत कर्मरूप तृण का विध्वंस करती है ।
सदासुखदासजी