
कम्मं विपरिणमिज्जइ सिणेहपरिसोसएण सुतवेण ।
तो तं सिणेहमुक्कं कम्मं परिसडदि धुलिव्व॥1859॥
कर्म रजों का चिकनापन शोषित हो जाता है तप से ।
अतः धूल-सम रूक्षकर्म रज खिर जाती है चेतन से॥1859॥
अन्वयार्थ : समस्त कर्म का परिणमन ऐसा होता है कि स्थिति घट जाती है और अनुभाग का अभाव हो जाता है, तब चिकनाई रहित कर्म धूल के समान खिर जाते हैं - गिर जाते हैं ।
सदासुखदासजी