
धादुगदं जह कणयं सुज्झइ धम्मंतमग्गिणा महदा ।
सुज्झइ तवग्गिधंतो तह जीवो कम्मधादुगदो॥1860॥
यथा स्वर्ण पाषाण अग्नि में तपने से सोना हो शुद्ध ।
कर्म धातु-सम मिला जीव भी तप-अग्नि से होता शुद्ध॥1860॥
अन्वयार्थ : जैसे पाषाण में मिला हुआ सुवर्ण महान अग्नि द्वारा धमकने से/ताप देने से शुद्ध होता है, तैसे ही कर्म धातु में मिला हुआ जीव महान तपरूप अग्नि से तपाये जाने से शुद्धता को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी