पं-सदासुखदासजी
एवं पिणद्धसंवरवम्मो सम्मत्तवाहणारूढो ।
सुदणाणमहाधणुग्गो झाणादितवोमयसरेहिं॥1862॥
संवररूप कवच धारणकर समकित रथ पर हो आरूढ़ ।
महाधनुष श्रुतज्ञान हाथ ले रण में जाये संयम शूर॥1862॥
सदासुखदासजी