
संजमरणभूमीए कम्मारिचं पराजिणिय सव्वं ।
पावदि संजमजोहो अणोवमं मोक्खरज्जसिरिं॥1863॥
ध्यान-तपोमय बाणों द्वारा कर्म शत्रु को करे परास्त ।
संयम योद्धा या लेता है अनुपम मुक्ति-लक्ष्मी राज्य॥1863॥
अन्वयार्थ : इस तरह पूर्वोक्त प्रकार से पहना है संवर रूप बख्तर जिसने और सम्यक्त्वरूप वाहन पर चढकर श्रुतज्ञानरूप महान धनुष को धारण करके, संयमीरूपी योद्धा संयमरूप रणभूमि में कर्मरूपी वैरियों को ध्यानादि तपमयी बाणों से जीतकर उपमारहित मोक्ष की राज्य-लक्ष्मी को प्राप्त होता है । ऐसा निर्जरानुप्रेक्षा का वर्णन किया ।
सदासुखदासजी