
जीवो मोक्खपुरक्कडकल्लाणपरंपरस्स जो भागी ।
भावेणुववज्जदि सो धम्मं तं तारिसमुदारं॥1864॥
शिवपुर तक कल्याण परम्परा से पाता है जीव सुपात्र ।
जिन उत्तम उदार भावों से उसे धर्म कहें जिनराज॥1864॥
अन्वयार्थ : जो जीव मोक्षपर्यन्त कल्याणों की परम्परा का भाजन है/पात्र है, वह जीव सम्पूर्ण सुख को देने में प्रवीण उदार धर्म को प्राप्त होता है । जो निर्वाण के योग्य नहीं, वह उत्तम धर्म को धारण नहीं कर सकता है । जिसके कर्मों की स्थिति घट जाती है और पाप प्रकृतियों का रस मन्द रह जाये, उसके भाव धर्म धारण करने के होते हैं ।
सदासुखदासजी