
धम्मेण होदि वुज्जो विस्ससणिज्जा पिओ जसंसी य ।
सुहसज्झो य णराणं धम्मो मणणिव्वुदिकरो य॥1865॥
पूज्य तथा विश्वास पात्र हो प्रिय हो और यशस्वी हो ।
धर्म कर सकें सुख से प्राणी मन में तृप्ति शान्ति हो॥1865॥
अन्वयार्थ : धर्म धारण करने वाला पुरुष ही जगत में पूज्य होता है । धर्म के प्रभाव से सारे जगत को विश्वास करने योग्य होता है, सभी को प्रिय होता है, यशवान होता है । मनुष्यों को धर्म, सुख से साधने योग्य होता है, मन में आनंद करने वाला है ।
सदासुखदासजी