जावदियाइं कल्लाणाइं सग्गे य मणुअलोगे य ।
आवहदि ताणि सव्वाणि मोक्खं सोक्खं च वरधम्मो॥1866॥
स्वर्ग लोक अरु मनुज लोक में होते हैं जितने कल्याण ।
उत्तम धर्म सभी ले आवे शिवसुख भी होता है प्राप्त॥1866॥
अन्वयार्थ : इस मनुष्यलोक में या देवलोक में जितने कल्याण/सुख के कार्य हैं; उन सभी कल्याणों और निर्वाण के अनंत अविनाशी सुख को इस श्रेष्ठ धर्म से ही प्राप्त करते हैं ।

  सदासुखदासजी