
ते धण्णा जिणधम्मं जिणदिट्ठं सव्वदुक्खणासयरं ।
पडिवण्णा दिढधिदिया विसुद्धमणसा णिरावेक्खा॥1867॥
जिनवर कथित सर्व दुःखनाशक धर्म धैर्य से जो धारें ।
निर्मल मन, निरपेक्ष भाव से उन जीवों को धन्य कहें॥1867॥
अन्वयार्थ : जो दृढ धैर्य के धारण करने वाले हैं, उज्ज्वल मन के धारक हैं, इस लोकपरलोक में ख्याति, लाभ, पूजादि की अपेक्षारहित हुए हैं, समस्त दु:खोें का नाश करने वाले हैं, जिनेन्द्र कथित ऐसे सत्यार्थ धर्म को धारण करते हैं; वे जगत में धन्य हैं । धर्मरहित पुरुषों से तो यह जगत भरा पडा है, केवल महात्मा पुरुष ही विरले हैं, वे धन्य हैं ।
सदासुखदासजी