
वीए उम्मग्गविहरिदा सुचिरमिंदिंयस्सेहिं ।
जिणदिट्ठणिव्वुदिपहं धण्णा ओदरियं गच्छंति॥1868॥
जिसे विषय-वन के कुमार्ग में इन्द्रिय अश्व चलाते हैं ।
उसे छोड़ जिन-कथित मोक्षपथगामी को सब धन्य कहें॥1868॥
अन्वयार्थ : विषयरूप वन में इन्द्रियरूप दुष्ट अश्वों से बहुत समयपर्यंत उत्पथ मार्ग/ऊबडखाबड मार्ग में विहार करते हुए, कोई धन्य पुरुष इन्द्रियरूपी दुष्ट घोडों से उतरकर जिनेन्द्र द्वारा दिखाये गये निर्वाण मार्ग की ओर गमन करते हैं ।
सदासुखदासजी