
रागेण य दोसेण य जगे रमंतम्मि वीदरागम्मि ।
धम्मम्मि णिरासादम्मि रदी अदिदुल्लहा होइ॥1869॥
जग के विषय भोग में जो जन राग-द्वेष से रमण करें ।
विषय स्वाद बिन धर्मरुचि उनको होना अति दुर्लभ है॥1869॥
अन्वयार्थ : जगत्वर्ती लोक को राग-द्वेष के साथ क्रीडा करते हुए निरास्वाद वीतराग धर्म में रति करना अत्यन्त दुर्लभ है ।
सदासुखदासजी