
सफलं माणुसजम्मं तस्स हवदि जस्स चरणमणवज्जं ।
संसार दुक्खकारणकम्मागमदारसंरोधं॥1870॥
भवदुःखनाशक कर्म-आस्रव-द्वार रोकता जो चारित्र ।
है जिसका निर्दाेष उसी का मानव जन्म सफल है मित्र॥1870॥
अन्वयार्थ : जिस मनुष्य के, संसार के दु:खों को देने वाले कर्म, उनके आगमन के द्वार को रोकने में समर्थ - ऐसा निर्दोष चारित्र होता है, उसी का मनुष्य जन्म सफल है ।
सदासुखदासजी