
जह जह णिव्वेदुवसम वेरग्गदयादमा पवढ्ढंति ।
तह तह अब्भासयरं णिव्वाणं होइ पुरिसस्स॥1871॥
जैसे-जैसे हो वैराग्य दया उपशम अरु चित्त निरोध ।
बढ़ते जाते वैसे-वैसे शीघ्र निकट आता है मोक्ष॥1871॥
अन्वयार्थ : इस मनुष्य का, धर्मानुराग, कषायों की मन्दता, वैराग्य, समस्त प्राणियों के प्रति दया और इन्द्रियों का दमन जैसे-जैसे बढता जाता है; तैसे-तैसे निर्वाण अतिशयरूप से समीपता को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी