सम्मद्दंसणतुम्बं दुवालसंगारयं जिणिंदाणं ।
वयणेमियं जगे जयइ धम्मचक्कं तवोधारं॥1872॥
समकित धर्म-चक्र की नाभि द्वादशांग उसके आरे ।
बारह व्रत हैं धुरी धर्म की जैन धर्म जयवन्त रहे॥1872॥
अन्वयार्थ : जिनेन्द्र भगवान का धर्मचक्र जगत में जयवन्त प्रवर्तता है । कैसा है धर्मचक्र? जिसका सम्यग्दर्शनरूप मध्य का तुम्ब है और आचारांगादि द्वादश अंग ही जिसके आरे हैं, पंच महाव्रतादिरूप जिसकी नेमि/धुरा है और तपरूप जिसकी धार है, ऐसा भगवान का धर्मचक्र कर्मरूपी वैरियों को जीतकर परम विजय को प्राप्त होता है । ऐसा धर्म भावना का वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी