
दंसणसुदतवचरणमइयम्मि धम्मम्मि दुल्लहा बोही ।
जीवस्स कम्मसत्तस्स संसरंतस्स संसारे॥1873॥
इस भव-वन में कर्म लिप्त जीवों को सम्यग्दर्शन-ज्ञान ।
सम्यक् चारित तप में बोधि-आराधन अति दुर्लभ मान॥1873॥
अन्वयार्थ : संसार में परिभ्रमण करते हुए जीव कर्म से लिप्त है, उसका ज्ञान-दर्शन-चारित्रतप रूप धर्म में बोधि/रत्नत्रय की परिपूर्णता तथा आराधनासहित मरण होना दुर्लभ है ।
सदासुखदासजी