संसारम्मि अणंते जीवाणं दुल्लहं मणुस्सत्तं ।
जुगसमिलासं जोगो जह लवणजले समुद्दिम्म॥1874॥
लवणोदधि में लकड़ी के दो दुकड़ों का मिलना दुर्लभ ।
त्यों भव-सागर में जीवों को मानव तन मिलना दुर्लभ॥1874॥
अन्वयार्थ : जैसे लवणसमुद्र की पूर्व दिशा में डाला गया जूडा/जुआ और पश्चिम दिशा के लवणसमुद्र में डाली गई समिला (उस जुआ में लगाने वाली लकडियाँ) इन दोनों का संयोग होना दुर्लभ है; तैसे ही अनन्त संसार में जीवों को मनुष्यपना दुर्लभ है ।

  सदासुखदासजी