असुहपरिणामबहुलत्तणं च लोगस्स अदिमहल्लत्तं ।
जोणिबहुत्तं च कुणदि सुदुल्लहं माणुसं जोणी॥1875॥
अशुभ भाव हैं बहुत लोक में मनुजेतर हैं लोक महान ।
जीवों की हैं योनि बहुत इसलिए मनुजतन दुर्लभ जान॥1875॥
अन्वयार्थ : इस लोक में मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, प्रमाद इत्यादि अशुभ परिणामों की बहुलता है । मिथ्यात्व-असंयमादि भाव निरन्तर बहुत बार बहुत प्रवर्तते हैं और मनुष्य बिना अन्य जीवों की बहुलता है । योनि की बहुलता है/चौरासी लाख योनिस्थान हैं और उनमें एक सौ साढे निन्याणवे लाख करोड कुल हैं, इनमें से मनुष्ययोनि को पाना दुर्लभ है ।

  सदासुखदासजी