देसकुलरूवमारोग्गमाउगं बुद्धिसवणगहणाणि ।
लद्धे वि माणुसत्ते ण हुंति सुलभाणि जीवस्स॥1876॥
मिले मनुज पर्याय किन्तु उत्तम कुल देश रूप दुर्लभ ।
आयु बुद्धि आरोग्य श्रवण अरु ग्रहण सभी को नहीं सुलभ॥1876॥
अन्वयार्थ : और यदि कदाचित् मनुष्यपना भी पाया तो उत्तम देश में उत्पन्न होना दुर्लभ है । अनेक पापरूप धर्मरहित मूर्ख से व्याप्त देश में उत्पन्न हो तो मनुष्य जन्म वृथा ही पशुओं के समान व्यतीत करता है । यदि उत्तम देश में भी उत्पन्न हुआ तो उत्तम कुल में उत्पन्न होना अति दुर्लभ है । हीन, नीच, मांसभक्षी, मद्यपायी, अनर्थ करने वाले या नीच आजीविका करने वाले या चांडाल, कलाल, लुहार, धोबी, नीलगर इत्यादिकों के कुल में उत्पन्न हुआ तो उत्तम देशादि का पाना भी वृथा ही रहा और उत्तम कुल में भी उपजे तो सुन्दर नयन, नासिका, कर्णादि इन्द्रिय और हस्त-पादादि अंग, अंगुली आदि उपांगों की हीनाधिकता रहित जगत के आदरने योग्य सुन्दर रूप पाना दुर्लभ है और देश, कुल, रूपादि भी मिल जाये और रोगसहित शरीर पाया तो सभी का पाना वृथा गया । रात्रि-दिन हाय-हाय करता हुआ वेदनाजनित आर्तध्यान को प्राप्त हो दुर्गति को जाता है । यदि निरोग शरीर भी मिल जाये तो दीर्घायु मिलना दुर्लभ है । यदि उत्तम देश, कुल, रूप, आरोग्यादि समस्त सामग्री पा करके भी कोई गर्भ में ही मर जाता है । कोई एक दिन, दो, दिन, महीना, दो महीना, वर्ष, दो वर्ष, पाँच वर्ष, बीस वर्ष इत्यादि अल्प आयु में ही मर जाते हैं; अत: दीर्घायु पाना अति दुर्लभ है और दीर्घायु भी पा ली तो उज्ज्वल बुद्धि मिलना दुर्लभ है, यदि बुद्धि भी मिल गई तो संसार के विषयक षायों में रच-पच जाता है । धर्मश्रवण करना दुर्लभ है । यदि धर्मश्रवण कर ले तो ग्रहण करना दुर्लभ है । इसलिए मनुष्यपना भी पा लिया तो उत्तम देश, उत्तम कुल, रूप, आरोग्य, दीर्घायु, उज्ज्वल बुद्धि, धर्मश्रवण, धर्मग्रहण होना अति दुर्लभ है ।

  सदासुखदासजी