लद्धेसु वि तेसु पुणे बोधी जिणसासणम्मि ण हु सुलहा ।
कुपधाकुलो य लोगो जं वलिया रागदोसा य॥1877॥
यदि ये सब मिल जायें तो भी रत्नत्रय-निधि सुलभ नहीं ।
मिथ्या-मत से भरा लोक यह राग-द्वेष भी महाबली॥1877॥
अन्वयार्थ : देश, कुलादिक प्राप्त हो जाने पर भी जिनशासन में बोधि/दीक्षा लेने की बुद्धि पाना दुर्लभ है; क्योंकि राग-द्वेष बडे बलवान हैं । इनके उदय से लोग कुमार्ग में आकुलित हुए भटकते हैं । चारित्रमोह के उदय से रत्नत्रय मार्ग में प्रवर्तन करना दुर्लभ है ।

  सदासुखदासजी