इय दुल्लहाय वोहीए जो पमाइज्ज कइ वि लद्धाए ।
सो उल्लट्टइ दुक्खेण रदणगिरिसिहरमारुहिय॥1878॥
दुर्लभ-बोधि प्राप्त करके भी कोई जीव प्रमाद करे ।
बड़े कष्ट से चढ़े रत्नगिरि शीश किन्तु वह पुनः गिरे॥1878॥
अन्वयार्थ : ऐसी बोधि/रत्नत्रय का प्राप्त होना दुर्लभ है और कदाचित् बोधि को भी प्राप्त हो जाय तो भी प्रमादी हो जाये तो बोधि से छूट जाता है । वह रत्नगिरि शिखर पर चढकर भी प्रमादी हुआ दु:ख से नीचे गिर जाता है ।

  सदासुखदासजी