
फिडिदा संती बोधी ण य सुलहा होइ संसरंतस्स ।
पडिदं समुद्दमज्झे रदणं व तमंधयारम्मि॥1879॥
यथा अँधेरे में समुद्र में गिरा रत्न मिलना दुर्लभ ।
बोधि प्राप्त कर नष्ट करे तो पुनः बोधि मिलना दुर्लभ॥1879॥
अन्वयार्थ : जैसे अंधकार के समय में समुद्र में गिरा हुआ रत्न का पाना दुर्लभ है, तैसे ही संसार में परिभ्रमण करते हुए जीव का नष्ट हुआ बोधि/रत्नत्रय का पुन: पाना दुर्लभ है ।
सदासुखदासजी