ते धणा जे जिणवर दिट्ठे धम्मम्मि होंति संबुद्धा ।
जे य पवण्णा धम्मं भावेण उवट्ठिदमदीया॥1880॥
जिनवर कथित धर्म में होते हैं प्रबुद्ध जो वे नर धन्य ।
बोधि प्राप्तकर भाव सहित जो धर्म करें वे भी अति धन्य॥1880॥
अन्वयार्थ : जो जिनवर द्वारा उपदिष्ट धर्म में प्रबुद्ध होते हैं, वे धन्य हैं और जो उद्यमपूर्वक भावों से धर्म को प्राप्त होते हैं, वे धन्य हैं । ऐसी बोधिदुर्लभ भावना का नव गाथाओं में वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी