+ अब धर्म ध्यान के प्रकरण में आये द्वादश भावनाओं का स्वरूप का वर्णन करके प्रकरण को समेटते हैं - -
इय आलंबणमणुपेहाओ धम्मस्स होंति ज्झाणस्स ।
ज्झायंतो ण वि णस्सदि ज्झाणे आलंबणेहिं मुणी॥1881॥
इस प्रकार अनुप्रेक्षायें हैं धर्म ध्यान का आलम्बन ।
धर्म ध्यान से कभी न च्युत हों जो लें इनका आलम्बन॥1881॥
अन्वयार्थ : ये बारह अनुप्रेक्षायें धर्मध्यान का आलंबन हैं । इन भावनाओं का आलंबन करके ध्यान करने वाले मुनि ध्यान के संबंध से विचलित नहीं होते, ध्यान की शुद्धता ही होती है ।

  सदासुखदासजी