
आलंबणं च वायण पुच्छणपरिवट्टणाणुपेहाओ ।
धम्मस्स तेण अविरुद्धाओ सव्वाणुपेहाओ॥1882॥
स्वाध्याय के आलम्बन हैं वाचन, पृच्छन, परिवर्तन ।
अनुप्रेक्षाओं को भी जानें धर्म ध्यान का आलम्बन॥1882॥
अन्वयार्थ : अत: निर्दोष ग्रन्थों का या अर्थ का या ग्रंथ-अर्थ दोनों का योग्य पुरुषों को पढाना - शिक्षा देना या स्वयं पढना, वह वाचना है । स्वयं का संशय दूर करने के लिये या तत्त्व का दृढ निश्चय करने के लिये, विनयपूर्वक बहुज्ञानियों से पूछना, वह पृच्छना है । आगम से या बहुज्ञानियों से जो अर्थ जाना, उसका मन में निरंतर अभ्यास करना, वह अनुप्रेक्षा है । पहले सीखे/पढे ग्रन्थों का शुद्ध पाठ करना, ग्रन्थ-अर्थ दोनों को शामिल करके करना, वह परिवर्तन है । वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, परिवर्तन - इन चार के स्वाध्याय से बुद्धि अतिशयरूप होती है और प्रशंसा योग्य उज्ज्वल परिणाम होते हैं तथा सर्वोत्कृष्ट धर्मानुराग होता है । संसार, देह, भोगों से विरक्तता होती है, तप की वृद्धि होती है । इसलिए समस्त द्वादश अनुप्रेक्षा धर्मध्यान का निर्दोष अबाध आलंबन है, अत: धर्मध्यानी के द्वादश भावनाओं का अवलंबन श्रेष्ठ है ।
सदासुखदासजी