आलंबणेहिं भरिदो लोगो झाइदुमणस्स खवयस्स ।
जं जं मणसा पेच्छदि तं तं आलम्बणं हवइ॥1883॥
ध्यानेच्छुक को आलम्बन से भरा हुआ है सारा लोक ।
जहाँ कहीं भी चित्त लगाये वह पदार्थ आलम्बन हो॥1883॥
अन्वयार्थ : ध्यान करने का है मन जिसका, ऐसे क्षपक को समस्त लोक ध्यान के आलंबनों से भरा है । वीतरागी होकर जिस-जिस वस्तु को देखता है, वह-वह वस्तु ध्यान का आलंबन है; क्योंकि ध्यान करते हैं, वे समस्त विषय-कषायों का निग्रह करके परम साम्यभाव को प्राप्त करना चाहते हैं और वीतरागी मुनियों के समस्त पदार्थ में साम्यभाव प्रगट हुआ है, इसलिए वीतरागी मुनियों के समस्त पदार्थ ही ध्यान के अवलंबन हैं ।

  सदासुखदासजी