इच्चेवमदिक्कंतो धम्मज्झाणं जदा हवइ खवओ ।
सुक्कज्झाणं झायदि तत्तो सुविसुद्धलेस्साओ॥1884॥
इसप्रकार जब क्षपक पूर्णतः धर्म ध्यान को प्राप्त करें ।
अति विशुद्ध लेश्या धारणकर शुक्ल ध्यान आरम्भ करें॥1884॥
अन्वयार्थ : जिस अवसर में वीतरागी क्षपक, जिस प्रकार से धर्मध्यान का वर्णन किया उसको पूर्ण करके आगे बढता है तो लेश्या की उज्ज्वलता को प्राप्त होता हुआ शुक्लध्यान को ध्याता है । इस प्रकार एक सौ सडसठ गाथाओं में धर्मध्यान का वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी