पं-सदासुखदासजी
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अब बारह गाथाओं में शुक्लध्यान का वर्णन करते हैं -
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ज्झाणं पुधत्तसवितक्कसवीचारं हवे पढमसुक्कं ।
सवितक्केक्कत्तावीचारं ज्झाणं विदियसुक्कं॥1885॥
है पृथक्त्व वितर्क सहित वीचार प्रथम जानो शुक्ल ध्यान ।
है एकत्व वितर्क सहित अविचार कहा द्वितीय शुक्ल ध्यान॥1885॥
सदासुखदासजी