+ अब पृथक्त्ववितर्कवीचार नाम का प्रथम ध्यान को तीन गाथाओं में कहते हैं - -
दव्वाइं अणेयाइं तीहिं वि जोगेहिं जेण ज्झायंति ।
उवसंतमोहणिज्जा तेण पुधत्तंत्ति तं भणिया॥1887॥
भिन्न-भिन्न द्रव्यों को तीन योग से ध्याते हैं मुनिराज ।
गुणस्थान उपशान्त मोह थित, अतः पृथक्त्व कहें जिनराज॥1887॥
अन्वयार्थ : जिनके मोह का उपशम हो गया है, वे साधु अनेक द्रव्यों को मन, वचन, काय से ध्याते हैं । इस कारण उस प्रथम शुक्लध्यान को पृथक्त्व कहा है । पृथक्त्व नाम अनेक का है । वे अनेक प्रकार के योगों से अनेक अर्थ को ध्याते हैं, इसलिए इसे पृथक्त्व कहते हैं ।

  सदासुखदासजी