जम्हा सुदं वितक्कं जम्हा पुव्वगदअत्थकुसलो य ।
ज्झायदि ज्झाणं एदं सवितक्कं तेण तं झाणं॥1888॥
श्रुतज्ञान में कहे अर्थ में कुशल मुनीश्वर धरते ध्यान ।
श्रुतज्ञान ही है वितर्क इसलिए कहें सवितर्क महान॥1888॥
अन्वयार्थ : क्योंकि वितर्क नाम श्रुत का है । जो पूर्वगत अर्थ में कुशल होता है, वह इस ध्यान को ध्याता है, इसलिए इस ध्यान को सवितर्क कहते हैं । पूर्व के अर्थ को जानने वाले के आदि के दो शुक्लध्यान होते हैं ।

  सदासुखदासजी