अत्थाण वंजणाण य जोगाण य संकमो हु वीचारो ।
तस्स य भावेण तयं सुत्ते उत्तं सवीचारं॥1889॥
व्यंजन अर्थ योग में परिवर्तन वीचार कहाता है ।
यह विचारयुत ध्यान सूत्र में सवीचार कहलाता है॥1889॥
अन्वयार्थ : भावों से अर्थ का पलटना तथा अक्षरों का पलटना, मन-वचन-काय के योगों का पलटना, उसे वीचार कहते हैं । इसलिए सूत्र में प्रथम शुक्लध्यान को सवीचार कहते हैं; क्योंकि अनेक द्रव्यों को अनेक योगों से ध्याते हैं, इसलिए इसे पृथक्त्व कहते हैं और वितर्क नाम श्रुत का है । श्रुत के अर्थ सहित जो ध्यान, वह सवितर्क है । इस ध्यान में अर्थ पलटते हैं, शब्द पलटते हैं, योग पलटते हैं, इससे इसे सवीचार कहते हैं । इसलिए पहले शुक्लध्यान को पृथक्त्ववितर्कवीचार कहते हैं । इस प्रकार प्रथम शुक्लध्यान का स्वरूप कहा ।

  सदासुखदासजी