पं-सदासुखदासजी
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अब एकत्ववितर्क अवीचार नाम के द्वितीय शुक्लध्यान को तीन गाथाओं में कहते हैं -
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जेणेगमेव दव्वं जोगेणेगेण अण्णदरगेण ।
खीण कसाओ ज्झायदि तेणेगत्तं तयं भणियं॥1890॥
क्षीण कषायी मुनिवर केवल एक आत्मा ध्याते हैं ।
किसी एक ही योग द्वार से अतः इसे एकत्व कहें॥1890॥
सदासुखदासजी