
सुचिरमवि संकिलिट्टं विहरंतंं झाणसंवर विहूणं ।
ज्झाणेण संवुडप्पा जिणदि अहोरत्त मेत्तेण॥1898॥
ध्यान और संवर विहीन संक्लेश युक्त चारित चिरकाल ।
धरे किन्तु अन्तर्मुहूर्त जो ध्यान धरे वह क्लेश हरे॥1898॥
अन्वयार्थ : ध्यान नाम संवर से रहित पुरुष किंचित् ऊन पूर्वकोटिपर्यंत क्लेशसहित तपश्चरण करके जितने कर्म को जीतता है, उन कर्म को ध्यान से संवररूप पुरुष अन्तर्मुहूर्त में जीत लेता है ।
सदासुखदासजी