एवं कसाय जुद्धंमि हवदि खवयस्स आउधं झाणं ।
ज्झाणविहूणो खवओ जुद्धेव णिरावुधो होदि॥1899॥
कषाय नाश के लिए क्षपक को शस्त्ररूप होता यह ध्यान ।
रण में आयुध बिन योद्धासम ध्यान विहीन क्षपक को मान॥1899॥
अन्वयार्थ : ऐसे ही क्षपक के कषायों के युद्ध में ध्यान आयुध है, ध्यान रहित क्षपक आयुध रहित है । जैसे रणभूमि में आयुधरहित मल्ल वैरी को जीतने में समर्थ नहीं होता, तैसे ही ध्यानरूप आयुध से रहित क्षपक कर्मरूप वैरी को जीतने में समर्थ नहीं होता ।

  सदासुखदासजी