ज्झाणं करेइ खवयस्सो वट्ठंभं विहीण चेट्ठस्स ।
थेरस्स जहा जंतस्स कुणदि जट्ठी उवठ्ठंभं॥1901॥
चलने में असमर्थ वृद्ध को लाठी यथा सहायक हो ।
त्यों असमर्थ क्षपक को शिवपथ में यह ध्यान सहायक हो॥1901॥
अन्वयार्थ : जैसे गमन करते हुए वृद्ध पुरुष को लाठी अवलंबनरूप होती है, गिरने से बचा लेती है; तैसे ही हीन चेष्टा के धारक क्षपक को भी ध्यान अवलंबनरूप है, रत्नत्रय से चिगनेडि गने नहीं देता है ।

  सदासुखदासजी