
मल्लस्स णेहपाणं व कुणइं खवयस्स दढबलं झाणं ।
झाणविहीणो खवओ रंगे व अपोसिवो मल्लो॥1902॥
बलवर्धक है दुग्ध मल्ल को ध्यान क्षपक को बलवर्धक ।
ध्यान विहीन क्षपक हारे ज्यों मल्ल अखाड़े में निर्बल॥1902॥
अन्वयार्थ : जैसे मल्ल के दूध, घी आदि का पीना दृढ बलदायक है; तैसे ही क्षपक के यह ध्यान आत्मिक बल को दृढ करता है । जैसे रणभूमि में शारीरिक बल के बिना मल्ल वैरियों को जीत नहीं सकता है, तैसे ही संन्यास के अवसर में ध्यानरहित क्षपक कर्मरूपी वैरियों को नहीं जीत सकता है ।
सदासुखदासजी