झाणं किलेससावदरक्खा रख्खाव सावदभयम्मि ।
झाणं किलेसवसणे मित्तं मित्तं व वसणम्मि॥1904॥
हिंसक पशुओं से ज्यों रक्षा करे शस्त्र1 त्यों ध्यान करे ।
संकट में ज्यों मित्र सहायक दुःख में ध्यान सहाय करे॥1904॥
अन्वयार्थ : जैसे दुष्ट तिर्यंचों के भय में कोई योद्धा रक्षक होता है, तैसे ही क्लेशरूप दुष्ट तिर्यंचों के भय में ध्यान रक्षक है । जैसे क्लेश व्यसन कष्ट में जो अपना मित्र हो, वह सहायी होता है; तैसे ही कष्टों में, व्यसनों में ध्यान ही मित्र है ।

  सदासुखदासजी