
ज्झाणं कसायवादे गम्भधरं मारुदेव गम्भधरं ।
झाणं कसायउण्ेह छाही छाहीव उण्हम्मि॥1905॥
गर्भगृह त्राता वायु से अरु कषाय से आता ध्यान ।
छाया रक्षा करे धूप से राग धूप से रक्षक ध्यान॥1905॥
अन्वयार्थ : जैसे प्रबल पवन चल रही हो, वहाँ कोई पुरुष अनेक गृहों के बीच गर्भगृह में जाकर बैठ जाये तो उसे पवन की बाधा नहीं होती है; तैसे ही कषायरूप प्रबल पवन चल रही हो, वहाँ ध्यानरूपी गर्भगृह में स्थित पुरुष को बाधा नहीं होती । जैसे ग्रीष्म की आताप को, छाया उस आताप का निवारण करती है; तैसे ही कषायों के आताप को, ध्यान छाया के समान निवारण करता है ।
सदासुखदासजी