
झाणं कसाय डाहे, होदि वरदहो दहोव डाहम्मि ।
झाणं कसायसीदे अग्गी अग्गीब सीदम्मि॥1906॥
यथा दाह के लिए सरोवर राग शान्त करता है ध्यान ।
अग्नि बचाती शीत वायु से कषाय-शीत अग्नि-सम ध्यान॥1906॥
अन्वयार्थ : जैसे ग्रीष्म की दाह में श्रेष्ठ जल से भरा हुआ द्रह दाह को दूर करता है, तैसे ही कषायों के दाह में ध्यान, आताप हरने वाले द्रह के समान है । तथा जैसे शीतजनित वेदना में अग्नि उपकारक है, तैसे ही कषायरूप शीत को दूर करने के लिए ध्यान अग्निसमान है ।
सदासुखदासजी