झाणं विसयछुहाए य होइ अण्णं जहा छुहाए वा ।
झाणं विसयतिसाए उदयं उदयं व तण्हाए ॥1909॥
विषयक्षुधा की शान्ति हेतु यह ध्यान कहा है अन्न समान ।
विषय तृषा की शान्ति हेतु यह ध्यान कहा है नीर समान॥1909॥
अन्वयार्थ : जैसे क्षुधावेदना की पीडा को अन्न दूर करता है, तैसे ही विषयों की चाहरूप क्षुधावेदना को मेटने के लिए ध्यान समर्थ है । जैसे तृषा की पीडा मेटने को शीतल मिष्ट जल समर्थ है, तैसे ही विषयों की तृष्णा मेटने को ध्यान समर्थ है ।

  सदासुखदासजी